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बस का इंतज़ार: कैसे डीटीसी दिल्ली की रफ़्तार को रोक रही हैं.

किसी शहर को समझने के लिए, आपको सबसे पहले उस शहर के रास्तो और उन रास्तो पर सफ़र करने के अंदाज़ को समझना चाहिए, और इस बीच आप उस शहर की खूबियाँ, खामियां और बाकी सब बारीकियां खुद-ब-खुद समझ जाते हैं. कोई शहर कैसे सुबह अपने काम के लिए घर से बाहर निकलता हैं, कैसे शाम को अपने घर वापिस लौटता हैं, कैसे फुर्सत के चंद पलो में एक दुसरे से मिलता हैं, और ऐसे ही कई सारे सवालों के जवाब आपको उस शहर की यातायात व्यवस्था में छुपे मिल जायेंगे. एक अच्छा शहर, आपको बस, मेट्रो, और आखिरी मिल पर टेढ़े मेढ़े रास्तो से घर लाने लेजाने वाले रिक्शे में हस्ता, मुस्कुराता, अपने ख्वाबो को उधेड़ता बुनता मिल जाता हैं. वही एक थका, हारा शहर बिरान बस स्टॉप, महंगी यातायात व्यवस्था, और निजी वाहनों की अंधी भीड़ में एक अजीब सी मायूसी के साथ खड़ा होता हैं. और आजकल वही मायूसी दिल्लीवालो की आँखों में भी दिखने लगी हैं. और आप वजह समझ ही चुके होंगे, दिल्ली की यातायात व्यवस्था, खासकर दिल्ली की बसे.

दिल्ली की हरी, लाल, और नारंगी बसे, जिन्हें प्यार से दिल्लीवाले दिल्ली परिवहन निगम के संक्षित नाम डीटीसी से जानते हैं, हलांकि नारंगी बसे डीआईएमटीए…
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Minimum Wages: An Unlikely Solution To Democratic Growth of India

In his 2019 budget speech, Piyush Goyal, the Union Finance Minister of India, proposed annual assistance of six thousand rupees or in the main opposition party leader Rahul Gandhi's words a handout of seventeen rupees a day to farmers. Counteractively, Rahul Gandhi, himself, extended this idea of monetary assistance on the universal scale and promised a universal basic income (UBI) to all the poor in this country. The UBI can be seen as one of many steps toward eliminating the poverty and a way to democratize state's income and resources. However, it is a political promise and there is no guarantee, it will not turn out similar to fifteen lakh rupees promise made by the current ruling party before they came into the power. More importantly, it has put the veil on another social agreement, the Minimum Wages, which could really help the Indian economy and masses.